सुप्रीम कोर्ट में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ रिश्वतखोरी की जांच की मांग खारिज!

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सुप्रीम कोर्ट ने सहारा और बिड़ला कारोबारी घरानों पर छापेमारी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं अन्य के खिलाफ रिश्वतखोरी के सबूतो को नाकाफी बताते हुए एसआईटी जांच की मांग करने वाली अर्जी खारिज कर दी है. बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मोदी को बड़ी राहत मिली है. राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने इन दस्तावेजो को बड़ा सबूत बताकर प्रधानमंत्री मोदी को कई बार कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी.

इनकम टैक्स के छापे में सहारा के ऑफिस से एक कथित डायरी मिली थी, जिसमे  2003 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 25 करोड़ रुपये घूस देने की रकम लिखी थी. मोदी के अलावा दूसरे मुख्यमंत्रियो के खिलाफ भी इसे करोड़ो की रिश्वत लेने का बड़ा सबूत बताया गया.

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय की नई पीठ ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई की. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, “इधर-उधर के पन्नों, कागजात, ई-मेल प्रिंट आउट जैसी ‘कहीं-कहीं की सामग्रियों’ पर आधारित मामला महत्वरहित है. कानून के तहत सबूत के तौर पर इतनी अहमियत नहीं है कि प्राथमिकी दर्ज की जाए या जांच के आदेश दिए जाएं, वह भी ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे ऐसे पदाधिकारियों के खिलाफ, जिनके नाम का इन दस्तावेजों में जिक्र है.”

पीठ ने कहा कि, “उच्च पदाधिकारियों के खिलाफ जांच की मांग करने वाले मामलों को निपटाते वक्त ‘अदालतों को चौकस रहना है’, क्योंकि इस मामले में कोई ‘ठोस सामग्री’ या सामग्री से मिलते-जुलते ‘स्वतंत्र साक्ष्य’ नहीं हैं कि जांच के आदेश दिए जाएं.”

नई पीठ का गठन इसलिए किया गया क्योंकि वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने तत्कालीन भावी प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ से मामले की सुनवाई से अलग हो जाने की मांग की थी. प्रशांत की दलील थी कि चूंकि खेहड़ के प्रधान न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति की फाइल प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कार्यपालिका के पास लंबित है, इसलिए उन्हें इस मामले की सुनवाई से अलग हो जाना चाहिए.

एनजीओ ‘कॉमन कॉज’ की ओर से दावा किया था कि वे पन्ने सहारा ग्रुप और आदित्य बिड़ला ग्रुप की डायरियों की प्रविष्टियों का हिस्सा थे जिसमें ‘गुजरात सीएम’ और अन्य नेताओं जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था.

एनजीओ की याचिका खारिज करते हुए न्यायालय ने कहा, “कुछ ठोस, भरोसेमंद और स्वीकार्य साक्ष्य’ होने चाहिए.”

न्यायालय ने यह भी कहा कि, “आयकर निपटारा आयोग ने भी इन दस्तावेजों को प्रथम दृष्टया ‘गढ़ा हुआ’ करार दिया है.”

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