संपादकीय: केजरीवाल के विश्वास और विश्वासघात का भंवर

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रविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी एक बार फिर विश्वास और विश्वासघात के भंवर में फंस गई है. केजरीवाल के एक तरफ खुद को दिल्ली का मुख्यमंत्री समझने वाले उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया है तो दूसरी तरफ है सिसोदिया के बचपन के दोस्त कुमार विश्वास जो अब अपने अतिआत्मविश्वास में केजरीवाल को हटाकर पार्टी की कमान संभालने को बेताब है. आत्ममुग्ध छोरे-छैला सा दिखने वाले कुमार विश्वास के मन में अब केजरीवाल का पार्टी संयोजक का पद लेने की महत्वाकांक्षा जाग गई है.

पार्टी पर कब्जे को लेकर केजरीवाल और कुमार विश्वास के बीच खींचतान चरम पर है. भविष्य की अपनी सुविधा और दुविधा के हिसाब से विधायक और पदाधिकारी गुटबाजी में बंट और बांट रहे है. कोई केजरीवाल के बचाव में दीवार बनकर खड़ा है तो कोई कुमार के लिए कुर्बान होने को तैयार है.

आम आदमी पार्टी पंजाब और गोवा के चुनाव मैदान में कूदी तो मनीष सिसोदिया के मन में दिल्ली की गद्दी पर बैठने की हसरत जाग गई. कुमार विश्वास को भी लगा केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री बनेंगे तो दोस्त मनीष दिल्ली सरकार चलाएगा. ऐसे में दिल्ली सरकार और पार्टी में मन के गीत गाने-बजाने का मौका मिलेगा.

मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास की जोड़ी के लिए पंजाब और गोवा के चुनाव नतीजे सदमा लेकर आए. आम आदमी पार्टी के गढ़ दिल्ली में ही राजौरी गार्डन के उपचुनाव हारने पर एक और झटका लगा और रही-सही कसर उत्तर, पूर्व और दक्षिण दिल्ली के नगर-निगम चुनावो में हुई करारी हार ने पूरी कर दी.

पार्टी की लगातार छह हार को मुद्दा बनाकर अब कुमार विश्वास अपने भाग्य में पार्टी के नेतृत्व का छीका तोड़ना चाहते है. कुमार विश्वास के निशाने पर केजरीवाल और उनकी टीम है. वो पार्टी को हराने वाले मौजूदा पदाधिकारियो को घर पर बैठने की नसीहत दे चुके है. हार के बाद हुए इस्तीफो को उन्होने नाटक बताया है. खुद को राजनेता नहीं बल्कि कवि बताने वाले कुमार विश्वास अब अपने मियांमिट्ठू बनकर सामने आ गए है.

कुमार विश्वास अपने को पार्टी का सबसे लोकप्रिय कार्यकर्ता बताकर पार्टी के संयोजक पद पर अपनी दावेदारी ठोंक रहे है. व्यवस्था से लड़-भिड़ कर जनता के समर्थन से महानायक की तरह उभरे अरविंद केजरीवाल के लिए इस बार चुनौती कड़ी है. जनता का सहयोग और समर्थन तेजी से घट रहा है. पार्टी के विधायको का बीजेपी में जाने का सिलसिला शुरु हो चुका है. कांग्रेस-मुक्त भारत का खुला ऐलान करने वाली बीजेपी की अब आप-मुक्त दिल्ली की अनकही नीति है. ऐसे कठिन दौर में अब अपनो का ही विश्वास डगमग है.

कवि सम्मेलनो के मंच के संचालक-सूत्रधार बनने वाले कुमार विश्वास ने अन्ना के मंच पर भी माइक संभालकर अपने गीत-गाने-तराने से लोगो को जोड़ा-मोड़ा. लेकिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में अरविंद केजरीवाल अन्ना के सबसे होनहार मुन्ना बनकर उभरे.

आंदोलन की गरमाई आंच पर केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की हांडी चढ़ा दी. शांतिभूषण, प्रशांतभूषण, योगेन्द्र यादव, मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास जैसो के सिर पर सजी टोपी का रंग-रुप और ललकार तो वही रही लेकिन लक्ष्य बदल गए.

कांग्रेस के मंत्रियो के भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने वाले बीजेपी और मोदी से उलझ गए. केजरीवाल वाराणसी में मोदी के खिलाफ तो अमेठी में कुमार विश्वास राहुल गांधी के खिलाफ चुनावी अखाड़ो में उतरे लेकिन दिग्गजों के खिलाफ कद-काठी और दांव-पेंच में कमजोर होने से बुरी तरह से पिटकर लौटे.

आप पार्टी में हार की हताशा के बाद एक दूसरे पर हमले हुए. घर में ही तलवारे खींच गई और पार्टी दो फाड़ हो गई. दिल्ली से बाहर निकलने का ठीकरा मनीष सिसोदिया ने योगेन्द्र यादव के सिर पर फोड़ दिया. आम आदमी पार्टी को 2 करोड़ रुपए का चंदा देने वाले संस्थापक सद्स्य शांति भूषण और उनके पुत्र प्रशांत भूषण को बीजेपी का एजेंट बताकर और अपमानित कर पार्टी से निकाल दिया गया.

शांति भूषण ने ही सबसे पहले केजरीवाल को एक व्यक्ति, एक पद की सीख देते हुए योगेन्द्र यादव को पार्टी का संयोजक बनाने की वकालत की थी. अब ऐसी ही परोक्ष मांग के लिए कुमार विश्वास बगावती तेवर अपनाए हुए है. वो अपने दावे, दम और गम को पार्टी की बैठक में नहीं  बल्कि मीडिया में खुलेआम बोल चुके है. उनके बेहद करीबी दोस्त मनीष सिसोदिया ने दिल्ली से बाहर पार्टी के पैर फैलाने के लिए योगेन्द्र यादव की दूरदर्शिता को गुनाह ठहरा दिया था लेकिन खुद दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के लिए सिसोदिया ने केजरीवाल को पंजाब में भिजवाने के लिए अपना पूरा जोर लगा दिया.

योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को बीजेपी का एजेंट बताया गया लेकिन बीजेपी के सबसे करीब होने के आरोप कुमार विश्वास पर ही लगते रहे है. जामियानगर से आप पार्टी के अमानतुल्ला खान ने तो साफ कहा कि, “कुमार विश्वास जी आम आदमी पार्टी को हड़पना चाहते हैं और पार्टी को तोड़ना चाहते हैं, वो अपने घर पर विधायकों को बुलाकर कह रहे हैं कि मुझे पार्टी का संयोजक बनवाओ नहीं तो बीजेपी में चलो. बीजेपी हर एक को 30 करोड़ रुपये देने के लिए तैयार है.”

दिलचस्प बात ये है कि कुमार विश्वास पर हमला उस विधायक ने किया है जिसपर अपनी रिश्तेदार के यौन शोषण के आरोप लगे है. कुमार विश्वास पर भी ऐसे ही मिलते-जुलते आरोप आप पार्टी की एक महिला कार्यकर्ता ने लगाए है. महिला के मुताबिक कुमार विश्वास अमेठी के चुनाव प्रचार के दौरान उससे नजदीकी बढ़ाने के लिए बेताब थे और कुमार की कारगुजारियो की वजह से उसका वैवाहिक जीवन भी नष्ट हो गया.

कुमार विश्वास की नजर केजरीवाल के पार्टी संयोजक के पद पर भले ही है लेकिन उनका व्यक्तित्व और उनका आचरण इस पद के लायक कतई नहीं है. राजनीति में आने के बाद भी कुमार विश्वास ने सामान्य शिष्टाचार नहीं सीखा है. टीवी पर वो अक्सर अरविंद कहता है.. अरविंद करेगा.. अरविंद कहेगा जैसी लड़कपन से भरी भाषा का इस्तेमाल करते नजर आते है. सार्वजनिक मौको पर भी यदा-कदा केजरीवाल से आगे चलने की उनकी तस्वीरे उनकी नेतृत्व में अनास्था और असम्मान को ही प्रकट करती है.

कुमार विश्वास खुद को कवि बताते है लेकिन यूटयूब पर मौजूद कुछ वीडियो में वो मंच पर अश्लीलता की हद तक द्विअर्थी संवाद करते नजर आते है. कविता से ज्यादा वो चुटकुले और चुटीली राजनीतिक टिप्पणियां करते सुनाई देते है. हिंदी के प्रवक्ता रहे कुमार विश्वास का शब्दांडम्बर सस्ती तालियां तो बटोर लेता है लेकिन वो अक्सर शब्द की संवेदना और काव्य की करुणा की संस्कृति से विहीन ही रहता है.

कुमार के विश्वास और अविश्वास की परिधि का अंदाजा केजरीवाल को भी अच्छी तरह से है. केजरीवाल ने घर में लगी सुलगती आग को और भड़कने से रोकने के लिए कुमार विश्वास को फिलहाल अपना छोटा भाई बताया है. लेकिन कुमार विश्वास को याद रखना चाहिए कि योगेन्द्र यादव को कभी अपना बड़ा भाई बताने वाले केजरीवाल ने उन्हे उनकी मंडली और कुंडली समेत पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था.

बड़े भाई योगेन्द्र को घर से बाहर करने वाले केजरीवाल अपने छोटे भाई कुमार विश्वास को आसानी से बख्श देंगे इस पर भरोसा करना जरा मुश्किल है. इसकी वजह सिर्फ इतनी सी है कि केजरीवाल ने अबतक जो भी कहा है उसपर अपनी सुविधा और सहूलियत के हिसाब से पलटी भी मारी है.

केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगाते-लगाते भाई-भतीजावाद की नीति पर चल पड़े. रंगीले रंगरसियां और फर्जी डिग्री वालो को मंत्री बनाते रहे लेकिन योग्य महिलाओ को मंत्रीपद देने से हिचकते रहे. जनता ने उनपर विश्वास किया लेकिन सत्ता के लिए सिध्दांतो की श्रध्दांजलि देकर उन्होने विश्वासघात कर दिया.

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