दार्जिलिंग हिंसा, चिंगारी के पीछे का इतिहास

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Photo : Indian Express

दार्जिलिंग में तनाब बढ़ता जा रहा है. सोमवार को भी सड़को पर आगजनी रही, पुलिस ने हालात पर काबू पाने के लिए गश्त लगाए लेकिन हिंसा और आगजनी रुकने का नाम नहीं ले रही है. गौरखालैंड समर्थकों ने सोमवार को एक ट्रक में आग भी लगा दी. हिंसक प्रदर्शन में पैट्रोल बम का इस्तेमाल किया जा रहा, आती जाती गाड़ियों पर पैट्रोल बम से हमले हो रहे है. सुरक्षा के लिए लगे जवानो पर भी पैट्रोल बम से हमले हो रहे है.

दार्जिलिंग में गौरखालैंड के लिए हो रहे हिंसक प्रदर्शन के लिए गोरखा मुक्ति मोर्चा जिम्मेदार है जिसे राज्य सरकार की एक छोटी गलती के कारण इस मुद्दे पर फिर से प्रदर्शन करने का मौका मिल गया है.

इस हिंसक झड़पों के लिए राज्य सरकार को दोषी ठहराया जा रहा है. आरोप है कि राज्य की ममता बनर्जी सरकार  ने पहाड़ी इलाकों में नगर निगम के चुनाव जीतने के बाद वहां के स्कूलो में बांग्ला को आवश्यक तरीके से लागू करने का फैसला कर दिया था. जिसके बाद वर्षों से गोरखालैंड की मांग कर रहे गोरखा मुक्ति मोर्चा के लोगो को बैठे बैठाए एक मुद्दा मिल गया. हालांकि राज्य सरकार ने बाद में साफ कर दिया कि बांग्ला को दार्जिलिंग जैसे पहाड़ी स्कूलों में लागू करने की कोई बाध्यता नहीं है. लेकिन इसके बाद भी राज्य में यह हिंसक प्रदर्शन खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है.

दरअसल दार्जिलिंग जैसे नेपाल से सटे अन्य क्षेत्रों में नेपाली भाषी लोग रहते है, पश्चिम बंगाल में ये लोग उत्तरी क्षेत्र में है. नेपाली भाषी ये लोग अपने को पश्चिम बंगाल से अलग करना चाहते और देश में एक नए राज्य गौरखालैंड की मांग कर रहे है. भाषाई आधार पर अलग राज्य की इनकी यह मांग काफी पुरानी है. लेकिन काफी समय से शांत तरह से अपनी मांगे रखी जा रही थे लेकिन राज्य सरकार के स्कूलो में बांग्ला को लागू करने के बाध्यकारी आदेश के बाद इस मांग ने फिर से हिंसक रुप धारण कर लिया.

गौरखालैंड की मांग के पीछे एक लंबा इतिहास छिपा है. प्रारंभ में दार्जिलिंग सिक्किम का एक भाग था. बाद में भूटान ने इस पर कब्‍जा कर लिया. लेकिन कुछ समय बाद सिक्किम ने इस पर पुन: कब्‍जा कर लिया. परंतु 18वीं शताब्‍दी में पुन: इसे नेपाल के हाथों गवां दिया. किन्‍तु नेपाल भी इस पर ज्‍यादा समय तक अधिकार नहीं रख पाया.

1817 ई. में हुए आंग्‍ल-नेपाल में हार के बाद नेपाल को इसे ईस्‍ट इंडिया कंपनी को सौंपना पड़ा. लेकिन इस बार इसे पश्चिम बंगाल राज्य में शामिल किया गया. इस युद्ध के बाद Treaty of Sugauli पर 4 मार्च 1817 को हस्ताक्षर किए गए और सिक्सिम और डार्जिलिंग को भारत में शामिल कर लिया गया. इसके बाद समय समय पर गौरखालैंड (जिसे पहले गौरखास्तान कहा जाता था) की मांग उठने लगी.

अलग राज्य की मांग के लिए गौरखा लीग के लोग पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी से भी मिले थे. लेकिन बात नहीं बनीं थी. अलग राज्य की मांग को देखते हुए गौरखा लोगो का सम्मान करते हुए संविधान की अनुसूची 8 में नेपाली भाषा को शामिल किया गया. 1992 में 71वें संविधान संशोधन से नेपाली भाषा को संविधान में जगह मिली. इस समय संविधान में कुल 22 भाषाएं शामिल है. लेकिन फिर भी गौरखालैंड की मांग शांत नहीं हुई है.

आपको बता दे, संविधान के अनुच्छेद 3 (ए) और (सी) के अनुसार संसद को ही अलग राज्य बनाने का अधिकार है. इसी अनुच्छेद का उपयोग कर आंध्रप्रदेश को दो हिस्से में बांटा गया था (तेलंगाना और आंध्रप्रदेश). यहीं कारण है कि अब गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के लोग केंद्र सरकार से सीधे बात करना चाहते है. इनका कहना है कि राज्य सरकार उनकी इस मांग को नहीं सुन रही है. देश में भाषाई और भौगोलिक आधार पर अलग राज्य की मांग कोई नई नहीं है. देश के अलग अलग हिस्सो में इस तरह की मांग उठती रही है. उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल, पश्चिमांचल, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड़ और अवधप्रदेश जैसी मांग उठती रही है. वहीं असम की बात करें तो बोडोलैंड की मांग काफी पुरानी है. महाराष्ट्र में विदर्भ की मांग होती रही है.

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