तलाक.. तलाक.. तलाक.. गैरसंवैधानिक!

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खिरकार माननीय सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैरसंवैधानिक घोषित कर दिया है. जस्टिस खेहर की पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने आज 3-2 के फैसले से 1500 साल पुरानी इस पर्था को खत्म कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने 395 पेजों के ऐतिहासिक फैसले में शायरा बानो के अलावा पांच और याचिकाकर्ताओं (आफरीन रहमान, अतिया साबरी, इशरत जहां, गुल्शन प्रवीन) की याचिका पर यह फैसला सुनाया है. यह ऐतिहासिक फैसला सिर्फ उत्तराखंड की शायरा बानो से नहीं जुड़ा है ये फैसला देश में करोड़ो मुस्लिम महिलाओं की गरिमा से जुड़ा है.

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक (तलाक-उल-बिद्दत) को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन माना है. सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि तीन तलाक की यह 1500 साल पुरानी प्रथा जिसे 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) कानून में कानूनी दर्जा दिया गया था संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है. तीन तलाक की यह प्रक्रिया अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के दायरे में नहीं आती है. धर्म के नाम पर किसी को भी मौलिक अधिकारों के हनन का अधिकार नहीं दिया जा सकता.

अनुच्छेद 13 (1) के तहत गैरसंवैधानिक हैं तीन तलाक

सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के उस हिस्से को गैरसंविधानिक करार दिया है जो संविधान के अनुच्छेद 14, 15 21 का उल्लंघन करते है. आपको बता दे, संविधान का अनुच्छेद 13 न्यायालय को अधिकार देता है कि अगर कोई कानून संविधान के भाग 3 (मौलिक अधिकार) के दायरों में नहीं आता या उसका कोई भाग इसका उल्लंघन करता है तो उसे गैरसंवैधानिक माना जाएगा और उस कानून की मान्यता खत्म हो जाएगी. इसी अनुच्छेद के तहत सुप्रीम कोर्ट ने शरियत कानून की धारा 2 को गैरसंवैधानिक घोषित किया है.

हालांकि इस फैसले में दो जजों की सहमति नहीं थी. 5 जजों की इस संवैधानिक बेंच में 3 जजों ने इसे गैरसंवैधानिक माना है. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस खेहर और जस्टिस नज़ीर ने इस फैसले में तीन तलाक को सही माना है. जस्टिस कुरियन जोसेफ ने तीन तलाक को कुरान के खिलाफ माना है. जस्टिस फली नरिमन और जस्टिस उदय उमेश ललित ने तीन तलाक के इस कानून (1937 का कानून) को अनुच्छेद 13 के दायरे में लाकर गैरसंवैधानिक करार दिया है.

कुरान के खिलाफ है तीन तलाक

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कुरान की कई आयतों का जिक्र भी किया है साथ ही कोर्ट ने माना है कि तीन तलाक पवित्र कुरान के अनुरूप नहीं है. यह मनमाना और एक तरफा है. जबकि पवित्र कुरान में तलाक को तभी लेने की बात की गई है जब इसके लिए उचित कारण मौजूद हो. और साथ ही तलाक जैसी प्रक्रिया से बचने के लिए 2 मध्यस्थों की मौजूदगी में समझौता करने की कोशिश होनी चाहिए. अगर समझौता नहीं होता है तो अन्त में तलाक लिया जा सकता है.

मुस्लिम शादी कॉन्ट्रैक्ट है?

तीन तलाक को समझने के लिए हमें पहले यह समझना होगा कि आखिर मुस्लिमों में शादियों का मतलब क्या होता है. मुस्लिम कानून में निकाह (अरबी शब्द) को एक अनुबंध यानि कॉन्ट्रैक्ट माना गया है, जिसे वंश वृृद्धि और बच्चों की वैधता के लिए किया जाता है. कुरआन ने निकाह को मीसाक-ए-गलीज़ (मजबूत समझौता) करार दिया है.

इस कॉन्ट्रैक्ट को करने के लिए प्रस्ताव रखा जाता है जिसे प्रतिफल (मेहर) के साथ पत्नी द्वारा स्वीकार (कबुल) किया जाता है. धोखे, दवाब, बिना सहमति के साथ की गई शादी को शादी नहीं माना जाता. मुस्लिम कानून में शादी स्थाई और अनन्त नहीं है. इसे तोड़ा जा सकता है. वहीं शिया कानून के तहत कुछ शादियां सीमित समय के लिए भी की जाती है, जिसे मुटा (Mutta) मैरिज कहा जाता है. यह समय सीमा एक दिन, एक महीना या फिर एक साल की हो सकती है. आपको बता दे, भारत के कुछ हिस्सों में मुटा मैरेज आज भी होती है.

कितने साल की उम्र में होती है मुस्लिमों में शादी?

हिंदू कानून के तहत सिर्फ 21 साल की उम्र का पुरुष और 18 साल की उम्र की लड़की शादी के बंधन में बंध सकते है. लेकिन मुस्लिमों में ऐसा नहीं है, यहां महिला की शादी की सही उम्र उसकी यौवनारम्भ के आधार पर की जाती है. जिसे 15 साल की उम्र माना जाता है. 15 साल की उम्र की लड़की को वयस्क मानकर उसकी शादी कर दी जाती है. भारतीय वयस्कता कानून, 1875 मुस्लिमों की शादी, तलाक आदि पर लागू नहीं होता. इस कानून के तहत वयस्कता की उम्र 18 साल बताई गई है.

हिंदुओं में बहुविवाह दंडनीय और मुस्लिमो में नहीं

एक तरफ जहां हिंदू कानून के तहत पहली शादी रहते दूसरी शादी करने पर सजा का प्रावधान है. आईपीसी की धारा 494 में इसे दंडनीय अपराध बताया गया है. वहीं मुस्लिमों में बहुविवाह की इजाजत है. मुस्लिम व्यक्ति एक समय में चार शादियां कर सकता है. और किसी चौथी पत्नी को तलाक देकर पांचवी शादी भी कर सकता है. शिया कानून में मुटा मैरीज को गिना नहीं जाता. यानि मुटा मैरीज कितनी ही बार की जा सकती है.

किताबिया क्या है?

इसके अतिरिक्त मुस्लिम पुरूष कानून के अंतर्गत एक किताबिया (यहूदी अथवा ईसाई) स्त्री से शादी कर सकता है. लेकिन एक मूर्ति पूजन धर्म के लोगों के साथ शादी करने की मनाई है जिन्हें गैर किताबिया कहा गया है जैसे हिंदू धर्म है. लेकिन महिलाओं के लिए इसमें भी बंधन है. मुस्लिम महिलाएं न तो किताबिया और न ही गैर किताबिया से शादी कर सकती है. शिया कानून की बाते करें तो यहां न तो पुरुष न ही महिला गैर मुस्लिम से शादी कर सकते. लेकिन शिया कानून में मुटा विवाह के दौरान मुस्लिम पुरुष किताबिया महिला से शादी कर सकता है. हालांकि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत मुस्लिम (पुरुष और महिला) गैर मुस्लिम से शादी कर सकता है. लेकिन यह शादी एक सिविल मैरिज कहलाएगी न की मुस्लिम मैरिज. मुस्लिमों में तीन तरह की शादियो का जिक्र है. पहली सही, दूसरी बातिल और तीसरी फासीद. सही शादी पूरी तरह से मान्य है.

मुस्लिम कानून में न्यायिक पृथक का कोई प्रावधान नहीं है. जहां हिंदू कानून में आपसी सहमति से तलाक के लिए एक साल का न्यायिक पृथक का प्रावधान है. वहीं मुस्लिम कानून में तलाक के लिए ऐसी कोई अवधि का प्रावधान नहीं है. हिंदू मैरेज एक्ट की धारा 10 न्यायिक पृथक की बात करती है.

तलाक का हक़ किसे?

मुस्लिम कानून में तलाक़ का अधिकार मर्द को है और सारा झगड़ा इसी को लेकर है. यह विशेषाधिकार समानता के अधिकार का हनन करता है. हालांकि, तलाक देने का तरीका बहुत ही साफ है. तलाक देने के दो तरीके है जिनका जिक्र मुस्लिम कानून में है. पहला है तलाक-ए-सुन्नत और तलाक-ए-बिद्अत. तलाक-ए-सुन्नत को तलाक-ए-रजई भी कहा जाता है. तलाक-ए-रजई को दो रूप से किया जा सकता है तलाक-ए-हसन और तलाक-ए-अहसन.

तलाक-ए-अहसन के तहत मर्द एक बार तलाक बोलता है. फिर रुककर एक महीना बाद दोबारा एक बार तलाक बोलता है. ऐसा तीन महीने तक चलता है. तलाक-ए-अहसन में मर्द तलाक माहवारी के दौरान भी बोल सकता है. लेकिन तलाक-ए-हसन में माहवारी के दौरान तलाक कहना मना है.

विवाद आखिर किस तरह की तलाक प्रक्रिया पर है?

असली विवाद तलाक-ए-बिद्अत पर है. शिया और सुन्नी का वहाबी समूह अहल-ए-हदीस तलाक-ए-बिद्अत को नहीं मानता. तलाक-ए-बिद्अत में एक ही बार में तलाक, तलाक और तलाक को तीन बार कह दिया जाता है जिसके तलाक मान लिया जाएगा. अब पति-पत्नी साथ नहीं रह सकते. ऐसे तलाक को वापस नहीं लिया जाता. इसलिए तलाक-ए-बिद्अत को सही नहीं माना जाता है. तलाक-ए-सुन्नत को सही तलाक का तरीका माना गया है. ऐसे हालात में पत्नी की जिंदगी बेसहारा हो जाती है. मुसलमानों के बीच तलाक-ए-बिद्अत का ये झगड़ा 1400 साल पुराना है

चाहे तलाक-ए-सुन्नत हो या तलाक-ए-बिद्अत दोने तरह के तलाक के बाद पत्नी दोबारा अपने पति से शादी नहीं कर सकती. ऐसा करने के लिए पत्नी को किसी गैर मर्द से शादी कर उसे तलाक देना होगा.

तीसरे तरह का तलाक

तीसरे तरह का तलाक भी मुस्लिमों में मौजूद है. इसे तलाक-ए-तफवीज़ कहा जाता है. इस तलाक के तरीके में मर्द अपनी पत्नी या अन्य किसी व्यक्ति को तलाक करने का अधिकार दे देता है. ऐसा नहीं है कि तलाक का अधिकार पत्नी को देने के बाद पति तलाक नही बोल सकता. यहां दोनों को तलाक देने का अधिकार मिल जाता है.

तलाक के बाद इद्दत अवधि क्यों ?

मुस्लिम कानून के तहत तलाक या फिर पति की मृत्यु के बाद महिलाओं को इद्दत अवधि के दौरान शादी करने से मना किया गया है. ऐसा इसलिए किया जाता है कि अगर महिला के गर्भ में संतान है तो उसके पिता का पता लग सके. यानि तलाक या पति की मृत्यु के बाद महिला इद्दत अवधि में अकेली रहती है. ताकि अगर गर्भ में बच्चा होता है तो पता चल जाए.

संविधान क्या कहता है

मुस्लिम कानून में मुस्लिम महिलाओं के साथ लगातार भेदभाव देखने को मिलता है. धर्म के नाम पर महिलाओं को मिलने वाली इस सजा को आखिर क्यों नहीं रोका जा सकता. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी को कानून के समक्ष बराबरी का अधिकार देता है लेकिन मुस्लिम कानून में महिलाओं के साथ असमानता देखने को मिलती है. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 एक समान नागरिक संहिता की बात करता है. लेकिन देश में एक समान नागरिक संहिता लागू नहीं है. मुस्लिमों में चार शादी करने की बात है वहीं हिंदूओं में दो शादी करने पर जेल की हवा खानी पड़ जाती है

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