संपादकीय: गुजरात के गधे कौन ?

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खिलेश यादव के अपने चुनाव प्रचार के दौरान मोदी और अमित शाह पर किए गए तंज के बाद गुजरात टूरिज्म के जंगली गधे के विज्ञापन के मायने अब हमेशा के लिए बदल गए है. ये अजीब संयोग है कि विज्ञापन की स्क्रीप्ट और उसका एक-एक शब्द मोदी और उनकी मंडली पर छायावाद का जोरदार और असरदार अर्थ पैदा कर रहा है.

अब तो सवाल ये भी उठ सकते है कि विज्ञापन की मूल स्क्रीप्ट ही कहीं मोदी को निशाना बनाने के लिए तो नहीं लिखी गई है.? विज्ञापन की स्क्रीप्ट..महज संयोग है या साजिश ?

गुजरात टूरिज्म के दो साल पुराने विज्ञापन में जंगली गधा हीरो है. पुरी दुनिया में सिर्फ गुजरात के कच्छ में ही जंगली गधे आज भी आजाद जिंदगी जीते है. विज्ञापन में गधे का मानवीयकरण करके उसकी खूबियों को अमिताभ बच्चन अपनी असरदार अावाज में गिना रहैं है लेकिन गधे का ऐसा अतिशयोक्तिपूर्ण चरित्र-चित्रण एक दूसरा ही द्विअर्थी रुपक गढ़ रहा है.

”अगली बार कोई आपको गधा कहे तो बिल्कुल बुरा मत मानिएगा, बल्कि उसे थैंक यू कहिएगा. मैं बताता हूं क्यों? गुजरात का सरताज, इंडियन वाइल्ड ऐस.

ये जनाब पूरी दुनिया में सिर्फ यहीं मिलेंगे. अहमदाबाद से डेढ़ घंटे दूर. गुजरात की वाइल्ड एस सेन्चुरी. महीनों हो गए इन्हें नहाए हुए, लेकिन दिखते हैं एकदम नीट एंड क्लीन.

ये वो शहर वाला गधा नहीं है जो सड़क पर खड़ा कोई बात सोचता रहता है. इनके पास खड़े होने और सोचने की फुर्सत कहां.’

70 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से भागते हैं ये भाई साहब… बड़ा हैंडसम जानवर हैं. सर्वगुण सपन्न. ऐसा गधा जो सारे गधों का नाम रोशन कर रहा है. ऐसे 4500 हैं यहां और खूब फल-फूल रहे हैं गुजरात के आंगन में. तो याद रहे गधा कोई गाली नहीं, तारीफ की थाली है. यहां खूश्बू है वाइल्ड लाइफ की. उनकी देखभाल की. यहां खुश्बू है गुजरात की. टिकट कटवा लो दूरबीन रख लो हाथ में. अब कुछ दिन गुजारो गुजरात में.”

 

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