कानूनी लड़ाई में चार्ली ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया!

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न दिनो 11 महीने के एक बच्चों को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं हो रही है. 11 महीने का चार्ली गार्ड इस दुनिया को कानूनी लड़ाई के बीच अलविदा कह चुका है. मिटोकॉन्ड्रियल सिंड्रोम से पीड़ित यह बच्चा तिल तिल मर रहा था. मिटोकॉन्ड्रियल सिंड्रोम एक ऐसी आनुवांशिक बिमारी है जिसका अभी तक कोई पूर्ण इलाज़ नहीं खोजा जा सका है. 11 महीने का चार्ली इस बिमारी से जूझ रहा था, बच्चे की मासपेशियां और दिमाग इस बिमारी के चलते कमजोर और क्षतिग्रस्त हो रही थी. और कानूनी लड़ाई में बच्चे का पूरा शरीर और ज्यादा क्षतिग्रस्त हो गया.

ऐसे में अमेरिका के डॉक्टर्स का कहना था कि उनके पास इस बिमारी का इलाज है. लेकिन कामयाब होगा के नहीं इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है. लेकिन कहा जाता है कि उम्मीद की एक किरण ही काफी होती है. अमेरिकी डॉक्टर्स के दावे पर चार्ली के माता पिता ने चार्ली के अमेरिका में इलाज कराने की इजाजत के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी. लेकिन कानूनी लड़ाई में माता पिता को अमेरिका में इस दुर्लभ बिमारी का इलाज कराने के लिए इजाजत नहीं मिली. आखिरकार 11 महीने के चार्ली की मासपेशियां और ज्यादा कमजोर हो गई और अंत में माता पिता ने अपने बच्चे को मौत की नींद भेजने का कठोर फैसला ले लिया.

दरअसल यूके की न्यायालय का मानना था कि प्रयोगात्मक इलाज से बच्चे के शरीर को नुकसान हो सकता है क्योंकि इससे पहले किसी भी व्यक्ति पर इस दुर्लभ बिमारी में यह इलाज आजमाया नहीं गया है. ऐसे में बच्चे को इस इलाज से नुकसान हो सकता है जबकि अमेरिका का कहना था कि इस इलाज में 10 फीसदी चांस है कि बच्चा ठीक हो सकता है.

बच्चे को प्रयोगात्मक इलाज ना मिलने पर बच्चो को आखिरकार इस दुनिया को अलविदा कहना पड़ा. चार्ली ने 28 जुलाई को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

इस मामले को दो तरफ से देखा जा सकता है . पहला अगर बच्चे को अमेरिका में इलाज कराने की इजाजत मिल जाती तो शायद बच्चा प्रयोगात्मक इलाज से ठीक हो जाता. लेकिन दूसरी तरफ नैतिकता के आधार पर यूके ने फैसला लिया. यूके का मानना था कि इस बिमारी में पहले कभी प्रयोगात्मक इलाज नहीं किया गया है ऐसे में बच्चे को इस इलाज से खतरा हो सकता था.

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