अम्बेडकर जयंती मनाने वाले भी जात-पात से उपर नहीं उठ पाए- उदित राज

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बीजेपी के दलित नेता और सांसद उदित राज का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रहते देश में कही भी दलितो और मुस्लिमो के साथ भेदभाव नहीं होगा. उदितराज के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी के नारे सबका साथ सबका विकास को केन्द्र सरकार जमीन पर उतार रही है. उदितराज का मानना है कि देश का दलित आज भी एकजुट नहीं है. यही वजह है कि ज्यादातर पार्टियां दलितो को पूरी हिस्सेदारी नहीं देती है. उन्हे कोटा भरने की तरह इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे में कांशीराम के गुरुमंत्र जिसकी जितनी संख्याभारी उसकी उतनी हिस्सदारी के हिसाब से दलितो को सम्मान, समानता और साझेदारी मिलनी चाहिए. उदित राज से हमने देश में दलित आंदोलन, मोदी राज, भगवा लहर, संघ परिवार और गौरक्षा की मुहिम के साथ दलितो की आशंका पर एक विशेष बातचीत की.

उदित राज को इस बात का मलाल है कि हर साल अम्बेडकर जयंती मनाने वाले अम्बेडकरवादी भी जात-पात से उपर नहीं उठ पाए. जातियो और उपजातियो में बंटे दलित समाज में कुछ प्रभावी दलित जातियां को दलितो होने का ज्यादा फायदा मिल जाता है. मायावती ने बीएसपी के ज्यादातर पद खुद की जाति के लोगो में बांटकर बहुजन समाज और दलित आंदोलन को नुकसान पहुंचाया है..

प्रश्न: उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बन गई. प्रचंड बहुमत से सरकार बन गई. योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बन गए. मंत्रिमंडल भी बन गया. आप उत्तर प्रदेश से ही आते है. पार्टी का दलित चेहरा है लेकिन आप सरकार का हिस्सा नहीं है.?

उत्तर: देखिए, मैं उत्तर प्रदेश का सांसद नहीं हूं. उत्तर प्रदेश में हमारी सक्रियता नहीं है. इसीलिए यह प्रश्न भी अपने आप में सही नहीं है कि मै उत्तर प्रदेश की सरकार का चेहरा नहीं हूं. दलित चेहरा आप कह सकते हो मीडिया लिखती रही है. 15-20 साल से लिखती रही है. पार्टी बड़ी है और अपस एंड डाउन होते रहते है और जो भूमिका मुझे दी गई है नॉर्थ वेस्ट दिल्ली की पार्लियामेंटरी कॉंस्टीट्यूंसी को देखने की वो मैं देख रहा हूं. बाकी हमारा जो खुद का संघठन है जिसकी स्थापना मैंने सन 97 में किया था. अनुसूचित जाति-जनजातियों का अखिल भारतीय परिसंघ. वो सामाजिक आंदोलन है वो तो चल रहा है. लेकिन जहां तक पार्टी की बात है, पार्टी ने जो भूमिका दिया उसको मैं निभा रहा हूं. बाकी पार्टी जो जिम्मेदारी देगी उसे जब जो उचित लगेगा जिम्मेदारी मिलेगी.

प्रश्न: दिल्ली में पार्टी के कुछ प्रवक्ता थे जो उत्तर प्रदेश में मंत्री बन गए. लेकिन विजय सोनकर शास्त्री जी वो भी मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं रहे. तो इसको क्या देखा जाए? मतलब जो दलित है जो सबका साथ सबका विकास की बातें है वो ईमानदारी से उसका पालन हो रहा है?

उत्तर:  देखिए, ऐसा है कि सभी को मौका मिलता है रोटेशन से और भागीदारी दी जाती है. और ये सच्चाई है इस देश की कि दलित किसी भी पार्टी में हो चाहे कम्यूनिस्ट पार्टी मे हो, चाहे सोशलिस्ट पार्टी में हो या एनसीपी में हो, बीएसपी में हो, कांग्रेस में हो या बीजेपी में हो जो ऐतिहासिक कारण है उसके पिछड़ने का वो समय पर लक्षित होते है. हां कुछ पार्टियां उन्हे ज्यादा जिम्मेदारी देती है. प्रोत्साहन देती है. कुछ कोटा भरने तक करने के लिए करती है. कोटा है तो सबको कोटा भरना पड़ता है. बहुजन समाज पार्टी भी कोटे के अतिरिक्त सीटे नहीं लड़ा पाती थी. तो एक ऐतिहासिक कारण है. सामाजिक कारण है जो इतने कम समय में नहीं दूर होंगे. और यही कारण है कि देश हमारा पिछड़ा हुआ है क्योकिं हम जातियों में बंटे हुए समाज थे. हजारो वक्त तक देश हमारा गुलाम था तो मुख्य कारण यहीं था. कि हजार जातियो में जब आप पूरे समाज को बांट दो तो लड़ने वाला कोई बचा ही नहीं. कोई कपड़े धोने वाला, कोई लोहे का, कोई बर्तन का कोई चमड़े का काम करने वाला हो गया. कोई बाल काटने वाला हो गया, कोई सोने का काम कर रहा है. उनको यह बता दिया गया कि तुमको अपनी जाति तक ही सीमित रहना है. उसी काम में ही तुम्हारा गुजारा है. यही तुम्हारा पेशा है. इसीलिए तो ये देश हजारो वर्ष तक गुलाम था कारण यहीं था. जाति के आधार पर जो बंटवारा है उसका कुप्रभाव कम किया जा सकता है अगर भागीदारी निश्चित कर दी जाए.

प्रश्न: मेरा सवाल इसीलिए था कि जब सबका साथ, सबका विकास नारा है तो जब देने की बारी है, मौका है, दिया भी जाना चाहिए तो ऐसा क्यों लग रहा है कि नहीं दिया.?

उत्तर: ऐसी बात नहीं है. भागीदारी दी गई है और केन्द्र में 12-13 मंत्री है. भागीदारी मिली है आप यह नहीं कह सकते कि भागीदारी नहीं मिली है.

प्रश्न: दयाशंकर पांडे का प्रसंग था. उन्होने मायावती को अपशब्द कहे लेकिन मायावती की हार के अगले ही दिन उन्हे पार्टी में वापस ले लिया गया तो इसे क्या माना जाए.?

उत्तर: देखिए, क्या परिस्थिति रही उस समय की, वो भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश की ईकाई जानती है. किन परिस्थितियो में शामिल करा दिया ये वो जानते है. इसका जवाब मैं नहीं दे पाउंगा. क्योंकि पूरे तथ्य को मैं जानता नहीं हूं और जरुरी नहीं कि हर सवाल का जवाब भी दिया जाए. और जिस सवाल, समस्य़ा, घटना से मैं जुड़ा नहीं तो उसका जवाब देना जरुरी नहीं है.

प्रश्न: सवाल इसलिए कि दलित के सम्मान के लिए, आत्मसम्मान के लिए, आपने खुद की भी अपनी पार्टी बनाई थी. अब आप बड़ी पार्टी का हिस्सा है.?

उत्तर: मैने अपनी पार्टी जरुर बनाई थी. लेकिन मै यह कह रहा हूं कि पूरे देश में क्या-क्या हो रहा है. कहां क्या हो रहा है. उस सबके लिए हम जिम्मेदार नहीं हो सकते है. और इतनी बड़ी पार्टी हो और ये देश इतना बड़ा है एक भूमिका सीमित हो जाती है. मेरी खुद की जब पार्टी थी तो भूमिका असीमित जरुर थी लेकिन जब बड़ी पार्टी होती है तो सबका अपना विभाग और भूमिका निश्चित की जाती है. अगर सभी ओवरलैप करने लगे तो बड़ी पार्टी का स्वरुप नहीं होता है. उस पार्टी में मैं राष्ट्रीय अध्यक्ष था तो पूरा देश क्षेत्र बनता था भले ही पूरा देश क्षेत्र था लेकिन वो ताकत नहीं थी. हमें यहां भले ही क्षेत्र सीमित हो लेकिन भूमिका अदा करने के अवसर ज्यादा हो गए है. संसद में जाकर आवाज उठाने की बात है तो जरुरी नहीं कि मैं हर घटनाक्रम को जानूं और उसका जवाब ही दूं.

प्रश्न: दलित आंदोलन के साथ जो दलित अस्मिता की बात है. सम्मान की बात है. कहीं ना कहीं मुख्य आरोप यही लगता है कि जो ब्राह्मणवादी समाज, मनुवादी व्यवस्था उसी के खिलाफ बाबा साहब आम्बेडकर ने शुरुआत की आपने भी दिल्ली के अम्बेडकर भवन में धर्मांतरण कराया 5 हजार लोगो का. तो फिर क्या वजह रही कि एक पार्टी जो मानी जाती है ब्राह्मणवाद को प्रश्रय देती है. मोटे तौर पर कहा जाता था कि बनिए-बामनो की पार्टी है फिर आप उसी पार्टी का हिस्सा हो गए.?

उत्तर: अम्बेडकर भवन में जब हम बौध्द धर्म की दीक्षा ले रहे थे. योजना 10 लाख की थी और लाखो लोग हुए भी. ये 5 हजार का आंकड़ा दुरस्त कर लीजिए. बीबीसी लंदन ने 1 लाख कहा, टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा 50 हजार बोला. काफी लोगो को आने नहीं दिया गया. सीमाएं सील कर दी गई थी.

प्रश्न: किन लोगो ने?

उत्तर: सरकार उस समय जो भी सरकार थी. और जहां तक दूसरी बात है. बाबा साहब की बात है तो कौन सा दलित है जो भले ही अम्बेडकर की विचारधारा को मानते हो. लेकिन सतह पर जाकर देखेंगे कि भले ही दिनभर अम्बेडकर चिल्लाते रहते हो. लेकिन जब धरातल पर जाकर आप देखेंगे तो जात-पात के उपर वो भी नहीं उठ पाए है. क्या वजह है कि जब कांशीराम जी ने शुरुआत की कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी. कहार थे, नाई थे, खटीक थे, पासी थे, वाल्मीकि थे. धानुक थे सभी बुनियाद में थे. सभी के नेतृत्व को डेवलेप किया गया लेकिन धीरे-धीरे एक जाति विशेष की पार्टी बनती गई बहुजन समाज पार्टी. 75 जिलो में से 70 जातियो के जिला अध्य़क्ष एक ही जाति के रहे. कॉऑर्डिनेटर ज्यादातर एक ही जाति के रहे. तो ये अम्बेडकरवाद है.? कम से कम मै समझ सकता हूं कि जाति नही समाप्त हो रही है तो कम से कम भागीदारी तो देना चाहिए. सभी जातियो को भागीदारी देते उसका परिणाम यह रहा है कि वो जातियां छूटती गई. बिखरती गई और 11 मार्च का जो परिणाम आया वो दिख गया. यहीं काम समाजवादी पार्टी ने किया. नाम था समाजवादी पार्टी और काम कर दिया कुछ और. यादव भाइयो को छोड़कर बाकी जातियां कटती गई और अंत में जो हमारी सोशल इंजीनियरिंग भारतीय जनता पार्टी की बनी वो प्रचंड बहुमत लेकर आई. मोदी जी का तो है ही. मोदीमय चुनाव हुआ जो केन्द्र सरकार ने विकास किया उसका असर पूरा गया. तो ये जो बाबा साहब अम्बेडकर की बात करते है. वो हमसे ज्यादा अम्बेडकरवादी नहीं हो सकते. उसकी वजह है कि जो परिसंघ अनुसूचित जाति और जनजाति का मैने बनाया उसमें 1 या 2 परसेंट भी स्टेट की टीम और राष्ट्र की टीम में मेरी उपजाति के लोग नहीं है. क्योकि हमने योग्यता के हिसाब से लोगो को रखा है जाति के हिसाब से लोगो को नहीं रखा है. किसी भी नेता के बारे में आप जानना चाहते है कि वो जातिवादी है या नहीं? या उसका चरित्र क्या है? समाज के प्रति क्या नजरिया है? यहां से काफी हद तक पता लग जाएगा कि उसके इर्द गिर्द दोस्त कौन है.? उसकी टीम में कौन लोग है.? जिस संगठन का वो मालिक है? या जिस संगठन का वो नियंत्रण करता है उस संगठन के जो पदाधिकारी है. ओहदेदार है. उनकी लिस्ट उठाकर विश्लेषण कर लिया जाए कि वो जाति से उपर उठ चुका है या नहीं. परिसंघ मेरा संगठन है तो उसके देश, प्रदेश, और जिले के संगठन क पदाधिकारियो को देखे तो उसमे मेरी उपजाति के 1 या 2 प्रतिशत भी लोग नहीं है. लेकिन सुश्री मायावती की जाति ज्यादा जरुर है लेकिन अगर विश्लेषण किया जाए तो जिम्मेदारी की, भागीदारी की, जिला अध्यक्ष की, प्रदेश की टीम में, कॉर्डिनेटर का तो 90 प्रतिशत तक उन्ही की स्वजाति के लोग है. तो वो अम्बेडकरवाद कहां? अम्बेडकरवादी तो मैं हुआ. सुश्री मायावती अम्बेडकरवादी नहीं है. शुरु में कह दिया कि मैं कुमारी हूं, कुंवारी हूं, चमारी हूं. लोगो को जगाने के लिए शुरु में कह दिया समझ में आता है. लेकिन लास्ट तक आपके व्यवहार में परिलक्षित होता रहा तो बाबा साहब अम्बेडकर का अनुयायी मैं हूं. मैं अपने बूते पर आंदोलन खड़ा किया.

प्रश्न: आपने लोकतंत्र में संख्यातंत्र की बात की. आपने खुद स्वीकार किया कि आपकी उपजाति की संख्या उतनी ज्यादा नहीं है. तो क्या ये माना जाए कि बीजेपी में आने के बाद भी आपका बीजेपी में उचित न्यायपूर्ण सम्मान नहीं हो रहा है.?

उत्तर: नहीं. वो तो ठीक कह रहे है आप. जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी. 22 प्रतिशत दलित है उत्तर प्रदेश में. मान लेते है 8 या 10 प्रतिशत दूसरे हैं तो 10 प्रतिशत भागीदारी दूसरो को दे दें. तो ये दुर्दशा ना होता. जो अल्पसंख्यक जाति है दूसरी जाति है उसके अनुपात में उसको दो. पता लगा खटीक, पासी, वाल्मीकि, धानुक, कोरी को टिकट नहीं दें रहे है. वो मेरे पास भाग कर आया. खैर मैं उसका समाधान नहीं हूं. लेकिन जिसकी जितनी भागीदारी है उसको उसी अनुपात में तो भागीदारी देनी चाहिए थी.

प्रश्न: सवर्ण समाज तो दलितो को एक ही वर्ग में वर्गीकृत कर देता है कि दलित है तो फिर दलितो में जातियां क्यों है एकता क्यों नहीं है.

उत्तर: नहीं है. दुर्भाग्य है. सवर्ण समाज को भी देखना चाहिए की सबको भागीदारी मिले.

प्रश्न: दलितो के अंदर ही जातियों का आपसी वर्चस्व और संघर्ष क्यों है? वो एक क्यों नही हो जाते है.?

उत्तर: देखिए, एक बात है कि 2-3 हजार वर्ष का कोढ़ एक जन्म में नहीं जाने वाली है. कौन है जो बहुत पढ़ा लिखा है और कहता है कि हम जात-पात नहीं है. उससे 2-3 सवाल आप पूछ लीजिए कि आपकी शादी किस जाति में हुई है? तो अपवाद को छोड़कर वो कहेगा कि जात-पात तो मैं मानता नहीं लेकिन शादी हमारी जात में ही हुई है. अगर उम्रदराज है और बच्चो के बारे में पूछें तो वो भी यही कहेंगे कि हमारी जाति में ही शादी हुई है और फिर भी वो कहेगा कि मैं जाति को नहीं मानता. ये दोहरे चरित्र का कमाल है फिर भी कहेगा कि हम नहीं मानते है जाति को.

प्रश्न: दोहरे चरित्र के विचारधारा के तौर पर या धारा के तौर पर सबसे बड़े आरोप जो लगते है वो संघ परिवार पर लगते है.?

उत्तर: देखिए, संघ परिवार के बारे में चर्चा करने की जरुरत ही नहीं है. वो अपना काम कर रहे है. हम अपना काम कर रहे है. ना मैं उनका कोई जवाबदेही हूं और ना ही उनका कोई प्रवक्ता हूं. यहां आप दलित आंदोलन की बात कर रहे है. और ये बात कर रहे है कि सवर्णो को भी उनको समावेश देना चाहिए उनकी संख्या देखते हुए. ये नहीं हो पाता है कई ज्यादा डोमिनेंट कास्ट है दलितो में ओबीसी में वो ज्यादा हिस्सा मार लेती है. चाहे कांग्रेस हो चाहे बीजेपी हो या कोई और पार्टी हो वो ज्यादा हिस्सा मार लेते है. लेकिन इसको देखना चाहिए.

प्रश्न: योगी जी मुख्यमंत्री बने. वो संन्यासी है. भगवाधारी है तो खास प्रतीक, प्रमाण, गोरक्षा, गाय ये सब. तो ये मुद्दे दलितो से भी जुड़े, उनकी सुरक्षा से भी जुड़े है और उनकी आशंका से भी जुड़े है.?

उत्तर: देखिए, ऐसा है, दलितो की अपनी विचारधारा है. उनकी अपनी विचारधारा है. लेकिन जहां तक राजनीतिक विचारधारा है वो एक है. राजनीतिक कार्यक्रम और उद्देश्य से सहमति होना चाहिए. व्यक्तिगत जिंदगी में कौन क्या खाता है, पहनता है, मानता है, कौन सी विचारधारा को मानता है. कोई फुले को मानता है. कोई साहू का मानता है. कोई दीनदयाल उपाध्याय का पुजारी है, कोई श्यामाप्रसाद मुखर्जी का पुजारी है. कोई नेहरु का, कोई सुभाष चन्द्र बोस का कोई भगत सिंह का हो सकता है. ये राजनीतिक विचारधारा की बात है  राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है. पॉलिटिकल पार्टी के ऑवजेक्टिव नहीं है. तो पॉलिटिकल पार्टी के उद्देश्यो में अनेकता नहीं होनी चाहिए. मतभेद नहीं होना चाहिए. बाकी पूजा-पाठ, कोई क्रिश्चयन है. कोई मुस्लिम हो कोई भगवा पहनता है. कोई कोट पहनता है. कोई पैंट पहनता है. ये कोई मायने नहीं रखता.

प्रश्न: वो तो विविधता है. समाज में विविधता रहनी भी चाहिए. बात ये है कि जो मूल मानवीय सिध्दांत है. समानता का बात है, समता की बात है. तो जब देने की बात आए या न्याय करने की बात आए तो उतना हो नही पाता है?

उत्तर: देखिए, मैने कहा कि ये हजारो वर्ष की समस्या है. ये आज की नहीं है. इस देश में एक भी कॉर्पोरेट हाउस दलित का नहीं. इस देश में एक भी फिल्म इंडस्ट्रीज के एक्टर, एक्ट्रैस नहीं है. कंपनियो में चीफ एक्जिक्यूटिव दलित नहीं है. कितने न्यूज पेपर है और इलेक्ट्रनिक चैनल है लेकिन किसी का सीईओ, मैनेजिंग एडिटर, या न्यूज एडिटर दलित नहीं है. प्रिंट मीडिया में भी किसी सीनियर तो क्या जूनियर पोजीशन पर भी दलित नहीं मिलता है. और जितनी इंडस्ट्रीज है उसमें भी दलितो की भागीदारी नहीं है. शून्य के बराबर है. ये हजारो वर्ष का समस्या है. और एक जन्म में जल्दी खत्म होने वाला नहीं है.

प्रश्न: आपने फील्ड में काम करते हुए मुस्लिम और दलितो के गठजोड़ के प्रयास किए. अभी जैसे उत्तर प्रदेश की सरकार बनी है. मुस्लिमों के बूचड़खाने और तीन तलाक की बात है. जो सरकार ने सबका साथ, सबका विकास को जो वादा किया है आपको क्या लगता है सरकार कर पाएगी या कर पा रही है?

उत्तर: तीन तलाक की जो बात है हम उसे थोप तो नहीं रहे. ये मुस्लिम समाज की महिलाओं की आवाज है और दुरुस्त है. उसको समर्थन देना क्या गलत है. पाकिस्तान में भी तीन तलाक नहीं है. इंडोनेशिया में नहीं है. इसमें सबका साथ सबका विकास में कोई विरोधाभास है ही नहीं. जहां तक बूचड़खानो की बात है आप लाइसेंस ले और काम शुरु करें. और काम अगर चालू है और लाइसेंस है तो कोई बंद करने वाला नहीं है.

प्रश्न:  पार्टी को इतना बड़ा बहुमत मिला. प्रधानमंत्री ने खुद श्मशान की बात की क्रबिस्तान की बात की. बिजली में भी दीवाली और रमजान की बात की. तो कहीं ना कहीं धुर्वीकरण की कोशिश तो हुई और उसका परिणाम भी निकला.

उत्तर:  नहीं, प्रधानमंत्री जी ने अगर कहा तो फीडबैक के आधार पर कहा है. शिकायते रही तब तो कहा है.

प्रश्न: लोकसभा चुनाव में भी प्रधानमंत्री ने कहा कि आज भी मुझे अछूत समझा जाता है. तो अगर सामाजिक समीकरण या समाजशास्त्र से देखा जाए तो वो उस वर्गीकरण में अछूत श्रेणी में नही आते है. आप इसको क्या मानते है?

उत्तर: नहीं जिस तरह से उनको कहा गया था. कहने वाले के मंतव्य को और उसकी सोच को उन्होने बोला था.

प्रश्न: वो तो प्रिंयका गांधी जी ने बोला ये नीची सोच है. उन्होने सोच की बात कही लेकिन मोदी ने सोच को सीधे जाति में परिवर्तित कर दिया?

उत्तर: प्रधानमंत्री जी उसको समझते है, अच्छी तरह से. इतना विजनरी प्रधानमंत्री देश को मिला नहीं कभी. तो जो प्रियंका जी ने कहा उस पूरे बयान को प्रधानमंत्री जी ने समझकर ही तो बोला होगा. और दूसरी बात वो बात तो बीत गई.

प्रश्न: नए फैसलो पर बात करते है. योगी सरकार ने जो अभी किसानो के ऋण माफ कर दिए है. आप रिवेन्यू ऑफिसर रहे है. राजकोष का जो बोझ है वो कैसे दूर होगा. ये कैसा निर्णय है?

उत्तर: राजस्व ईकट्ठा करने के बड़े तरीके है. किया जा सकता है और जरुरी नहीं है कि किसानो का कर्ज अगर माफ कर दिया जाए तो राजकोष में घाटा हो जाएगा. मैनेजमेंट की बात है. टैक्स वसूली बहुत नहीं हो पाती है. तमाम सारे ट्रांजेक्शन आउट ऑफ बुक्स होते है. अगर सारे लेन-देन को किताबो में ला दिया जाए और सही रुप से आधा भी टैक्स का रिएलाइजेशन हो जाए तो ये कोई बड़ी राशि नहीं है जो कर्ज माफी में गई है. इसकी भरपाई हो सकती है.

प्रश्न: आपने अपनी पार्टी बनाई. दलित आंदोलन से जुड़े रहे. अभी भी फील्ड में सक्रिय है. बीजेपी में आने के फैसले से क्या आप संतुष्ट है और सबका साथ, सबका विकास की जो बात है क्या उसमें सबके साथ न्याय होगा?

उत्तर: बिल्कुल मै संतुष्ट हूं. सबका साथ, सबका विकास का जो नारा दिया गया था उसे धरातल पर उतारा जा रहा है. और जो हमारा सामाजिक आंदोलन था 97 में वो यथावत चल रहा है. वो चलता रहेगा. कई कारण है. एक तो कर्मचारी, अधिकारी का है जो कि राजनीतिक नहीं हो सकते है. दूसरे निजी क्षेत्र में आरक्षण, बाबासाहब अम्बेडकर के विचार, जातिविहीन समाज की स्थापना, समानता, सम्मान का एक सामाजिक आंदोलन है. वो चलता रहेगा. परिसंघ चलता रहेगा. आगे भी चलता रहेगा तो कोई विरोधाभास नहीं है. चाहे अपनी पार्टी बनाना या किसी दूसरी पार्टी में जाना. एक सामाजिक सांस्कृतिक संघठन और एक राजनीतिक संघठन का हिस्सा मै हूं.

प्रश्न: एक सवाल और, केन्द्रीय विश्वविद्यालयो में जो दलित रिसर्च सेंटर बने हुए है उनमें खबरे है कि यूजीसी की ग्रांट रोक दी जा रही है. शायद ये मानकर की समाज में वर्गो को लेकर दलितो की टकराव की स्थिति ना बने तो इसको कितना सही मानते है आप?

उत्तर: अगर ऐसा है तो उसको गंभीरता से लिया जाएगा और जहां दलित अहित की बात होगी उसको बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सरकार के संज्ञान में लाया जाएगा. और सरकार उसको दुरुस्त करेगी.

प्रश्न: एक और सवाल जो गुजरात का मसला था. गौरक्षा आंदोलन का मसला. जो ब्राह्णवाद और मनुवाद के प्रतीक कहे जाते है. समाज में आ रहे है. मुख्यधारा का हिस्सा बन रहे है. उसमें दलित एक खास तबके पेशे से जुड़े हुए है. गुजरात में दलितो की पिटाई हुई. आपको नहीं लगता कि ये खतरे बढ़ रहे है.?

उत्तर: देखिए, प्रधानमंत्री जी ने इसके उपर बयान दिया था कि 80 प्रतिशत जो गौरक्षक है वो असमाजिक तत्व है. अगर ऐसी घटना गुजरात में होगी तो सरकार सख्त कदम उठाएगी. दंडित करेगी.

प्रश्न: राजस्थान में एक मौत हो गई गौरक्षा के उपद्रव में. उन्होने हमला किया. मेरा सवाल ये है कि संस्कृति में जो चीजे पीछे छूट गई थी. आधुनिकता में जो प्रतीक, प्रमाण थोड़ा दूर जा रहे थे. कहीं ना कहीं एक ही विचारधारा, एक ही सत्ता केन्द्र में आ गई है. तो उन चीजो को थोपने की कोशिश हो रही है.?

उत्तर: ये एक दौर है. दौर चलते रहते है. पूरा दुनिया में भी ये दौर ऐसा चल रहा है. अमेरिका में भी चल रहा है तो समाज में साइकिल घूमती रहती है. तो कोई ऐसा अनहोनी बात नहीं है.

प्रश्न: जो वंचित तबका है. जो समाज में हाशिए पर पड़ा है या जिसका प्रतिनिधित्व ऐसा नहीं हो पा रहा है, जिसे मानवीय न्यायपूर्ण जीवन नहीं मिल पा रहा है. और अगर वहीं चीजे दोहरा कर आ रही है तो चिंता की बात तो है?

उत्तर: देखिए, दलितो को आसानी से कोई देगा नहीं दलितो को एक होना पड़ेगा. क्या एक होने के लिए कुछ कर रहे है? बाबा साहेब अम्बेडकर की जयंती मनाकर के अपनी फर्ज अदायगी को कर देते है. आपने देखा प्रोफेट मुहमम्द का कभी कोई चित्र बनता है. जन्मदिन मनाया जाता है लेकिन प्रोफेट मुहम्मद की विचारधारा मुस्लिम समाज में कितना गहराई में पहुंची है. तो उसी तरह से दलित समाज और पूरे राष्ट्र के लिए तो किया ही था बाबा साहब अम्बेडकर ने, महिलाओं के लिए किया. देशभर में अम्बेडकर की जयंती से जुड़े कार्यक्रम देशभर में, राज्यो में स्कूल-कॉलेजो और सरकारी दफ्तरो में 15 दिन से 2-3 महीने तक चलते है लेकिन बाबा साहेब अम्बेडकर को मानते कितना है अंदर से. भाषण तो सब उछल-उछल के देते है कि बाबा साहेब ने कहा था कि मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ ये मेरे बस मे नहीं था लेकिन हिंदू धर्म में मै मरुंगा नहीं. भाषण में सभी उल्लेख करेंगे. भाषण में ये भी कहेंगे कि बाबा साहेब कहते थे कि जातिविहीन समाज की स्थापना इस देश में हो. लेकिन मंच पर भाषण देने के अलावा खुद वो जाति में फंसे है. तो बाबा साहेब कि विचारो को मानने की बात है.

प्रश्न: ये आरोप तो आप पर भी लग सकता है कि बाबा साहेब ने जो रास्ता दिखाया उस पर आप चले, धर्मांतरण तक कराया, संगठन बनाया, पार्टी भी बनाई लेकिन फिर एक बड़ी पार्टी का आप हिस्सा हो गए.?

उत्तर: नहीं, वो अलग बात है. इसमें तो हजारो जातियां है. बीएसपी में हजारो पार्टियां हैं. बात व्यक्तिगत जीवन की है. सामाजिक जीवन की है. राजनैतिक जीवन और सामाजिक जीवन को बराबर मत करिए. आज हमारे राजनीतिक जीवन के बारे में लिखा जा रहा है कि उदित राज ने समझौता कर लिया. बुध्दिष्ठ होकर के मनुवादी बन गया पूजापाठ सारा करने लगा. मै ये कहूं की चाहे मायावती हो या कांशीराम हो, चाहे इसाई हो, चाहे मुसलमान हो मंत्री जब बनता है तो ईश्वर की शपथ खाता या नहीं खाता है. गीता की कसम खाता कि नहीं तो क्या मुसलमान मनुवादी बन गया. जब राजनैतिक जीवन में आप जाएंगे तो जैनमंदिर में भी जाना पड़ेगा. हिंदू मंदिर में भी जाना पड़ेगा. गिरजाघर भी जाना पड़ता है. मुस्लिम समाज से भी पूछना पड़ेगा. सभी के धर्मो का आदर करना पड़ेगा. तो उसको तोड़-मरोडकर पेश किया गया.

और सुश्री मायावती ने जो ब्राह्मण सम्मेलन कराया था 2005 में लखनऊ में तो शंख बजाए गए थे. ब्राह्मण शंख बजाएगा हाथी बढ़ता जाएगा. सारा तंत्र-मंत्र उसी मंच पर हुआ था जहां मायावती बैठी हुई थी. वो बीएसपी के ऑफिस में हुआ, बीएसपी के मंच पर हुआ लेकिन बीएसपी के जो कार्यकर्ता है उनका दोहरा मापदंड है. उदितराज सही काम करे तो वो गलत नजर आता है लेकिन सुश्री मायवती गलत काम करें तो वो सहीं नजर आता है.

प्रश्न: कांशीराम उदाहरण देते थे कि जो समाज संरचना में बंटा खड़ा है उसे मैं समान क्षैतिज करना चाहता हू. तो जो वर्ग कुलीन तंत्र या आभिजात्य माना जाता था. अगर वो एक ही मंच पर आकर प्रशंसा कर रहा है. सहयोग की बात कर रहा है तो ये तो समाज की दूरी घटने की अच्छी बात है?

उत्तर: सहयोग लेना और देना दोनो चाहिए. सहयोग लिया ना उन्होने. मैं भी सहयोग ले रहा हूं. संसद में पहुंचकर आवाज उठा रहा हूं. क्या फर्क है? यही कि हम करें तो बुरा, वो करें तो ठीक.

प्रश्न: मायावती ने जो बहुजन समाज से सर्वजन समाज की राजनीति की उसपर आपका क्या कहना है.

उत्तर: ये उनका अपना नजरिया है पार्टी चलाने का उसपर मैं क्या कह सकता हूं. लेकिन शुरु में उन्होने कहा कि ये बहुजन ही होगा. दलित, ओबीसी होंगे तो बाद में स्वरुप को बदला. पहले तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार बाद में तिलक, तराजू, तलवार वाले सब आए.

प्रश्न: आखिरी सवाल, दलितो को अपनी पार्टी बनाकर ताकत बनना चाहिए या मुख्यधारा का हिस्सा बनकर अपनी साझेदारी और हिस्सेदारी रखनी चाहिए.

उत्तर: देखिए, ऐसा है. इतना बड़ा देश और ये मुमकिन नहीं है कि दो ही पार्टी सिस्टम हो. अमेरिका नहीं हो सकता वहां भी मल्टीपलपार्टी सिस्टम है. यूरोप में भी मल्टीपलपार्टी सिस्टम है और खिचड़ी सरकारे वहां भी बनती है. जनतंत्र वहां ज्यादा मैच्योर है. तो ये कोई असाधारण बात नहीं है. सुविधा के हिसाब से जिसको जहां अच्छा लगता है, अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से वहां जा सकता है.

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