अंकित का अड्डा: हे प्रभू !

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पिछले शनिवार को तफरी मारने के लिए मैं मिश्रा जी की डेरे की तरफ चला गया। कमरे में प्रवेश करते ही झटका लगा। वो इसलिए क्योंकि मिश्रा जी इंटरनेट पर दिल्ली से गोरखपुर जाने के लिए विमान की टिकट देख रहे थे।

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अंकित श्रीवास्तव, पत्रकार

जो लोग मिश्रा जी को जानते हैं, उनके लिए यह स्तबध कर देने वाली खबर है। ऐसा इसलिए क्योंकि हाल तक वह विमान तो क्या रेलगाड़ी के वातानुकूलित डिब्बे में यात्रा करने वाले को मूर्ख की संज्ञा देते थे।

बकौल मिश्रा जी, ”एसी का सफर भी कउनो सफर है जी। सब जाते एक ही जगह हैं लेकिन कौनो कौनो(कोई किसी से) बोलता नहीं है। जब से ई मोबाइल आ गया है लोग न जाने क्या निहारते रहते हैं आंख गड़ा के। महराज मिनरल वाटर कीन के पीते हैं। अब बताइए, ऐसे में सफ़र साफे सफर बन जाता है।”

मैंने छूटते हुए पूछा, ”क्या मिश्रा जी? गोपालगंज की गाड़ी गोरखपुर का करने चल दी? उ भी विमान से। कहां गये सब सिद्धांत आपके?”

ऐसा लगा मानो वह इस सवाल के लिए तैयार बैठे थे। अब क्या कहिएगा महराज? आप ही कहते थे भाजपा औरी कांग्रेस सब एके है। हम ही को नहीं बुझाता था।

मोदी की तारीफ करते नहीं थकते थे।  बुझाता था कि आजादी के करीब 65 वर्ष बाद मध्यम वर्ग के लोगों के भी ‘अच्छे दिन आयेंगे।’

मैंने हस्तक्षेप किया। अरे महाराज, क्या हो गया कि अचानक दार्शनिक की तरह बातें करने लगे।

क्यों निराश हो गये सरकार से?

अरे मत पूछिये। गरज—गरज के कांग्रेस की आर्थिक नीति की आलोचना करने वाले लोग जब सत्ता में आये तो उससे भी दु कदम आगे निकले।

खैर, इन सब चीजों का ताल्लुक आपके विमान के टिकट बुक करने से कैसे है?

अब वह असल मुद्दे पर आये। मोदी जी ने एक हाफ शर्ट पहनने वाले को मंत्री बनाया तो सोचा था वह मिडिल क्लास की जरूरतों को समझेगा। क्या पता था कि वह हमारे तबके को झटके पर झटके देगा।

भाक्क, पहेली मत बुझाइये। बताइये कि हुआ क्या?

अरे, मम्मी कही है कि अब छठ में नहीं आये तो ठीक नहीं होगा। रेल मंत्री जी की कृपा से अब चार महीना पहले टिकट कराना पड़ता है। जुलाई में याद नहीं पड़ा और अब देख रहे हैं तो कौनो ट्रेन में 200से कम वेटिंग नहीं है। परियार (पिछले से पिछले वर्ष) भी टिकट करना भूल गये थे, बिहार संपर्क क्रांति के स्लीपर में कोचा के गये। फाइन देके। गोरखपुर पहुंचे तो बुझाया कि दूसरी जिंदगी मिली है। नरक से भी रद्दी हालत। पैखाना—पेशाब यहां से करके चढ़े थे तो उतरने के बाद कर पाये।

अबकी बार उ गलती नहीं दोहराना चाहते हैं।

इस पर मैंने कहा कि तो क्या करना है किसी स्पेशल या प्रीमियम ट्रेन की घोषणा तो करेंगे ही आपके रेल मंत्री जी।

अब क्या था। अमूमन बातचीत में संयत रहने वाले मिश्रा जी उबल पड़े। उ का करेंगे। कबो देखे हो कौनो स्पेशल ट्रेन को 12 घंटा से कम लेट। रही बात प्रीमियम की तो पूरा बनियागिरी पर उतर आया है सार्वजनिक परिवहन सेवा प्रदाता। उसका कहना है कि जहां हो वहीं रहो। ढेर ऐने—वोने मत करो। करना है तो पाकिट ढीला करो। महराज स्लीपर का 400 का टिकट 1600 तक में मिलता है। ई कौन तरीका है भाई। ऊपर से परब, त्योहार में स्लीपर का हालत तो जनरल से भी बदतर रहता है। ऐसे में देखे तो एसी का किराया भरने से तो अच्छा है कि विमान का लगभग वहीं किराया दे और चौथाई से भी कम समय में घर पहुंच जाये।

मैंने बोला, ‘भई मैं तो पहले से ही इस बात का हिमायत करता हूं।’

इस पर मिश्रा जी जिनका पूरा नाम है— राहुल मिश्रा, बोल पड़े, ”हमरा क्या मालूम था कि ऐसा होगा। हर जगह प्रीमियम। प्रीमियम तत्काल। प्रीमियम ट्रेन। अब राजधानी और दुरंतो जैसी ट्रेनों के टिकट भी सर्ज प्राइसिंग के आधार पर बिकेंगे।

पहला झटका तो सरकार में आने के साथ ही दे दिया था मोदी सरकार ने। करीब 14 प्रतिशत किराया बढ़ाकर। अब तमाम तरीके का सरचार्ज और सेस भी जोड़ दिया है। प्राइवेट नोकरी करने वाला आदमी के कमाई बढ़ा कुछ? नहीं न? अब कहां से दे ई सरचार्ज। यही से माथा भिन्नाया हुआ है।

मैंने जोर देकर कहा कि कोई बात नहीं। सुविधाएं तो बढ़ ही गयी है न।

अंकित जी, हमको और मत पगलाइये। का सुविधा बढ़ा है जी? 15 का चिप्स अब भी 20 में मिलता है। प्लेटफार्म का पानी पीने लायक नहीं होता। स्वच्छता के नाम पर रेलवे के खाते में सेस तो चला जाता है लेकिन स्टेशन के बाहर से लेकर ट्रेन के अंदर तक कुछ भी साफ होता है क्या? क्या टॉयलेट, क्या सीट। ओह। कई ठो ट्रेन में तो अब तक चार्जिंग सॉकेट नहीं लगा है।

और भी बहुत कुछ कहा उन्होंने। तमाम बातें की और लूटेरी बन चुकी रेलवे को जमकर कोसा। टिकट कैंसल कराने पर बढ़े चार्ज से लेकर सुरक्षा तक पर बात की।

मैंने कहा तो क्या करना है करिये टिकट विमान का और एक कप चाय बनाइये।

मिश्रा जी ने चाय चढ़ा दी और जल्दी ही बुलबुलाने लगी..बोले, देखा राहुल गांधी का कल का ट्वीट, ”ट्रैन की रफ़्तार बढ़े न बढ़े मोदीजी ने किरायों की रफ़्तार बढा दी है! मोदीजी का मॉडल : आम जनता से लूट, कुछ उद्योगपति दोस्तों को छूट!”

चाय अब और उबलने लगी.. मिश्रा जी बोले भैया हमे ये बताओं राहुल जी जब इतना जानते-समझते है तो उनकी खुद की गाड़ी पटरी से क्यों उतर गई ?

खुद ही जवाब देते हुए बोले दोस्तो को छूट पर तो ट्वीटर पर छोड़ दिये लेकिन रिश्तेदार की लूट पर काहे चुप है ?

चाय परोसते हुए कहा “लो भाई चाय”…एक दो चुस्की के बाद कहा…”वैसे रेलवे स्टेशऩ की चाय जैसी भी हो लेकिन जब डिब्बे की खिड़की के पास बैठकर गटकते-सटकते है और खेत-खलिहान की हवा चेहरे पर सटती है तो सारी टेंशन हवा के साथ ही फुर्र हो जाती है.”

फुर्र को बताते-समझाते हुए उन्होने अपने सीधे हाथ को हवा में प्लेन की तरह उपर उठाया…मिश्रा जी का प्लेन थोड़ी देर के लिए हवा में रहा फिर जल्दी ही बिस्कुट उठाने के लिए लैंड कर गया. उन्होने मुझे भी बिस्कुट दिया.

मिश्रा जी ने एक-दो चुस्की के बाद कहा, यार..अगर स्टेशन की चाय नहीं होती तो एक चायवाला पीएम बन पाता.

मै चाय में डुबे बिस्कुट को अपने अधखुले मुंह तक ले जाता इससे पहले ही मिश्रा जी के सवाल से मेरा हाथ बीच में ही ठिठक गया और चाय में भीगा बिस्कुट अपने ही वजन से लचक-लटक कर चाय के कप में खुद ही दोबारा से डुबकी मार गया.

नोट: ये लेखक के निजी अनुभव और दृष्टि पर आधारित है. विवाद की स्थिति में सिर्फ लेखक ही अपनी रचना के लिए जिम्मेदार होंगे.

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